नेमिनाथ भगवान: जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर

नेमिनाथ, जिन्हें अरिष्टनेमि के नाम से भी जाना जाता है, जैन धर्म के वर्तमान अवसर्पिणी काल के 22वें तीर्थंकर हैं। भगवान महावीर, पार्श्वनाथ और ऋषभनाथ के साथ वे जैन परंपरा में सर्वाधिक भक्तिभाव से पूजे जाने वाले तीर्थंकरों में शामिल हैं। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार वे 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ से लगभग 84,000 वर्ष पहले हुए थे, जबकि आचार्य हेमचंद्र के त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र में यह अंतराल 81,000 वर्ष दर्ज है। उनके पूर्ववर्ती नमिनाथ और उनके बीच परंपरागत रूप से 5,81,750 वर्षों का विशाल कालांतर माना जाता है।

जन्म, वंश और भगवान कृष्ण से पारिवारिक संबंध

नेमिनाथ का जन्म शौरीपुर (द्वारका) में यदुवंश के राजा समुद्रविजय और रानी शिवादेवी के सबसे छोटे पुत्र के रूप में हुआ था। उनका जन्मदिवस श्रावण शुक्ल पंचमी माना जाता है। पशुपालक कुल में जन्म लेने के कारण बचपन से ही उन्हें पशुओं से गहरा लगाव हो गया था। चूंकि उनके पिता समुद्रविजय, भगवान कृष्ण के पिता वसुदेव के भाई थे, इसलिए नेमिनाथ को कृष्ण का चचेरा भाई बताया जाता है। मथुरा के कंकाली टीला में मिली कुषाणकालीन मूर्तियों में कृष्ण और बलराम को नेमिनाथ के चचेरे भाइयों के रूप में दर्शाया गया है, जो इस पारिवारिक संबंध की ऐतिहासिक पुष्टि करता है।

हरिवंशपुराण जैसे जैन महाकाव्य कृष्ण की सांसारिक विजयों और नेमिनाथ की आध्यात्मिक तपस्या के बीच के अंतर को उजागर करने के लिए इस रिश्ते का सुंदर उपयोग करते हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, कृष्ण की पत्नी सत्यभामा द्वारा ताना मारे जाने पर नेमिनाथ ने कृष्ण का शक्तिशाली शंख पांचजन्य अपने नथुनों से बजा दिया — जिसे उठाना तक कृष्ण के अलावा किसी और के लिए असंभव था। इसके बाद कृष्ण ने उन्हें मैत्रीपूर्ण द्वंद्व के लिए ललकारा, जिसमें तीर्थंकर होने के कारण नेमिनाथ ने उन्हें सहजता से पराजित कर दिया।

राजुल के साथ विवाह-प्रस्ताव और महान त्याग

नेमिनाथ का विवाह द्वारका के राजा उग्रसेन की पुत्री राजुलकुमारी (राजिमती) से तय हुआ था। किंतु विवाह भोज के लिए बांधे गए और काटे जाने वाले पशुओं की करुण चीत्कार सुनकर उनका हृदय गहरी करुणा से भर उठा। उन्होंने महसूस किया कि दूसरे सजीव प्राणियों की पीड़ा और हत्या की कीमत पर व्यक्तिगत सुख और वैवाहिक आनंद कभी नहीं बनाया जा सकता। इसी क्षण उन्होंने विवाह, राजपाट और सभी सांसारिक आसक्तियों — जिसे जैन धर्म में अपरिग्रह कहा जाता है — का पूर्ण त्याग कर दिया और मुनि बनकर गिरनार पर्वत की ओर प्रस्थान किया। यह घटना जैन धर्म में अहिंसा के सिद्धांत को एक साधारण व्रत से एक सार्वभौमिक नैतिक अनिवार्यता में बदलने वाला मील का पत्थर मानी जाती है।

उनकी होने वाली वधू राजुलकुमारी भी उनके पीछे साध्वी बन गईं, और उनके भाई रहनेमि भी मुनि बनकर उनके तपस्वी संघ में शामिल हो गए। जैन परंपरा में नेम-राजुल के संबंध को आठ पूर्व जन्मों तक बिना एक भी दोष देखे साथ रहने वाले प्रेम की अद्वितीय मिसाल माना जाता है — जो आध्यात्मिक इतिहास में एक असाधारण घटना है।

गिरनार पर्वत पर तपस्या, सर्वज्ञता और मोक्ष

गिरनार पर्वत, जिसे ऐतिहासिक रूप से ऊर्जयंतगिरि या रैवतक कहा जाता है, नेमिनाथ की संपूर्ण साधना और पवित्र भूगोल का केंद्र है। कल्पसूत्र के अनुसार उन्होंने हर तीन दिन में केवल एक बार भोजन करते हुए कठोर तपस्वी जीवन अपनाया, 55 दिनों तक अटूट ध्यान किया और अंततः रैवतक पर्वत पर एक महावेणु वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त की। उन्होंने कुल 1,000 वर्षों का जीवन जिया — जिसमें से 300 वर्ष कुंवारे जीवन में, मात्र 54 दिन तपस्वी मुनि के रूप में और लगभग 700 वर्ष सर्वज्ञ के रूप में उपदेश देते हुए बिताए। उन्होंने गिरनार पर्वत के पाँचवें शिखर पर मोक्ष प्राप्त किया, जो आज भी उनके निर्वाण स्थल के रूप में विश्वभर के जैन श्रद्धालुओं द्वारा पूजनीय है।

गिरनार: भारत का प्रमुख जैन तीर्थस्थल

नेमिनाथ के साथ अपने विशिष्ट और अनन्य संबंध के कारण गिरनार पर्वत भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्रमुख जैन तीर्थस्थलों (तीर्थ) में से एक बन गया। मध्यकाल में विशाल व्यापारिक संरक्षण के चलते यहाँ भव्य, सुदृढ़ और अलंकृत पत्थर-संगमरमर के मंदिर परिसरों का निर्माण हुआ, जो धार्मिक श्रद्धा और सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव दोनों के प्रतीक बने। हालांकि, इस पवित्र स्थल के परम महत्व के कारण 12वीं शताब्दी से श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के बीच इन शिखरों के स्वामित्व को लेकर सदियों-लंबा संप्रदायिक विवाद भी चलता रहा, जो आधुनिक युग तक कानूनी लड़ाइयों में तब्दील हुआ।

गिरनार नेमिनाथ मंदिर कैसे पहुँचें

मुख्य नेमिनाथ मंदिर परिसर आधार स्थल भवनाथ तलेटी से लगभग 3,800 से 4,000 सीढ़ियों की दूरी पर स्थित है। श्रद्धालुओं को सबसे पहले जूनागढ़ पहुँचना होता है, जो गिरनार तलेटी से मात्र 6-7 किमी दूर है।