About this path
Abhishek is the ceremonial bathing of the image of a Tirthankara, performed in Jain temples with pure water and, on major occasions, with other consecrated substances. This path is the recitation that accompanies it.
The verses turn on a point that Jain devotion states openly: the Tirthankara is already perfectly pure and needs no cleansing. The path says so directly — "तुम तो सहज पवित्र यही निश्चय भयो" — and then asks how one could bathe the one who washes away the impurity of the world. The rite is understood to purify the worshipper, not the worshipped.
What the devotee seeks is stated equally plainly: the shedding of the eight karmas, release from the body understood as a prison, and the attainment of samyaktva, right faith. Devotion here is a means of self-purification rather than a petition to a deity who intervenes.
अभिषेक पाठ
मैं परम पूज्य जिनेन्द्र प्रभुको भाव से वंदन करूं।
मन, वचन, काय, त्रियोग पूर्वक शीश चरणों में धरुं।।
सर्वज्ञ केवलज्ञान धारी की सुछवि उर में धरुं।
निग्रंथ पावन वीतराग महानकी जय उच्चरुं।।
उज्वल दिगम्बर वेश दर्शन कर हृइय आनंद भरुं।
आति विनयपूर्वक नमन करके सफल यह नरभव करूं।।
मैं शुद्ध जल के कलश प्रभुजी के पूज्य मस्तक पर करूं।
जल धार देकर हर्ष से अभिषेक प्रभुजी का करूं।।
मैं न्हवन प्रभुका भावसे कर सकल भव पातक हरु।
प्रभु चरणकमल पखारकर सम्यक्त्व की संपत्ति वरुं।।
ऐसे प्रभु की शांतमुद्रा को न्ह्वन जलतें करें।
'जस' भक्तिवश मन उक्ति तैं, हम भानु ढिंग दीपक धेरै।
तुम तो सहज पवित्र यही निश्चय भयो।
तुम पवित्रता हेत नहीं मज्जन ठयो ।
मैं मलीन रागादिक मलतें है रह्यौ ।
महामलिन तन में वसु विधिवश दुख सह्यौ ॥
बीत्यो अनंतो काल यह, मेरी अशुचिता ना गई।
तिस अशुचिताहर एक तुम ही, भरहु वांछा चित ठई॥
अब अष्टकर्म विनाश सब मल, दोष-रागादिक हरौ।
तनरूप कारागेह तैं, उद्धार शिववासा करौ ।।
क्षीरोदधि-सम नीर से, करूँ बिम्ब प्रक्षाल ।
श्री जिनवर की भक्ति से, जानूँ निज पर चाल ॥
तीर्थंकर का न्ह्वन शुभ, सुरपति करें महान।
पंचमेरु भी हो गये, महातीर्थ सुखदान ।।
करता हूँ शुभ भाव से, प्रतिमा का अभिषेक ।
बचूँ शुभाशुभ भाव से, यही कामना एक ।।
मैं रागादि विभावों से कलुषित हे जिनवर।
और आप परिपूर्ण वीतरागी हो प्रभुवर ।।
कैसे हो प्रक्षाल, जगत के अघ-क्षालक का।
क्या दरिद्र होगा पालक ? त्रिभुवन पालक का ॥
भक्ति भाव के निर्मल जल से अघ-मल धोता।
है किसका अभिषेक भ्रान्त चित खाता गोता ।।
नाथ! भक्तिवश जिन बिम्बों का करूँ न्हवन मैं।
आज करूँ साक्षात् जिनेश्वर का पर्शन मैं ॥