१. मंगल आचरण

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।

२. जैन धर्म: एक शाश्वत प्राकृतिक सत्ता

धर्म की शाश्वत सत्ता प्राकृतिक सृष्टि व्यवस्था के अनुसार मानी गई है।

३. 'जिन' और 'जैन' की परिभाषा

जैन धर्म की व्याख्या समझने के लिए इन दो शब्दों को समझना आवश्यक है:

४. वर्तमान अवसर्पिणी काल के २४ तीर्थंकर

यद्यपि अनंत कालों में अनंत तीर्थंकर हुए हैं, परन्तु वर्तमान कर्मयुग (अवसर्पिणी काल) में २४ तीर्थंकर हुए हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं:

  1. ऋषभनाथ (आदिनाथ)

  2. अजितनाथ

  3. संभवनाथ

  4. अभिनंदननाथ

  5. सुमतिनाथ

  6. पद्मप्रभ

  7. सुपार्श्वनाथ

  8. चन्द्रप्रभु

  9. पुष्पदन्तनाथ (सुविधिनाथ)

  10. शीतलनाथ

  11. श्रेयांसनाथ

  12. वासुपूज्यनाथ

  13. विमलनाथ

  14. अनंतनाथ

  15. धर्मनाथ

  16. शांतिनाथ

  17. कुंथुनाथ

  18. अरहनाथ

  19. मल्लिनाथ

  20. मुनिसुव्रतनाथ

  21. नमिनाथ

  22. नेमिनाथ

  23. पार्श्वनाथ

  24. महावीर स्वामी

५. प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का योगदान

इन चौबीस तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने आज से असंख्यात वर्ष पूर्व (एक कोड़ाकोड़ी सागर वर्ष पूर्व) अयोध्या नगरी में जन्म लिया था। उन्होंने ही समाज व्यवस्था के लिए प्रजा को जीवन जीने की ६ मुख्य कलाएं (षट्कर्म) सिखाई थीं:

  1. असि (Asi): शस्त्र विद्या / सुरक्षा।

  2. मसि (Masi): लेखन / लिपि।

  3. कृषि (Krishi): खेती।

  4. विद्या (Vidya): ज्ञान/शिक्षा।

  5. वाणिज्य (Vanijya): व्यापार।

  6. शिल्प (Shilp): कला और कारीगरी।


Key Points in English

Here are the essential highlights regarding the eternal nature of Jainism and the Tirthankaras: